कबीर ( संपादक : हजारी प्रसाद द्विवेदी ) भाग 1 ( पद संख्या 160 से 184 )
पद : 160 लोका मति के भोरा रे। जो काशी तन तजै कबीरा, तौ रामहिं कहा निहोरा रे।। तब हम वैसे अब हम ऐसे, इहै जनमका लाहा रे।। राम-भगति-परि जाकौ हित चित, ताकौ अचिरज काहा रे।। गुर-प्रसाद साधकी संगति, जग जीते जाइ जुलाहा रे।। कहै कबीर सुनहु रे सन्तो, भ्रमि परै जिनि कोई रे।। जस … Read more