कहने को हम आज इक्कीसवीं सदी के अत्याधुनिक समाज में जी रहे हैं और अपनी छद्मआधुनिकता का दम्भ भरते हैं परंतु न चाहते हुए भी हमें ये स्वीकारना होगा की जैसे-जैसे हम आधुनिक हो रहे हैं वैसे – वैसे हमारी रूढ़िवादिता और अधिक रूढ़ होती जा रही है । हम अपनी आधुनिक शिक्षा के दम पर किसी भी रूढ़िवादी परम्परा को कुतर्क के आवरण से ढक कर उसकी दुर्गन्ध को ढकने की चेष्टा करते हैं परंतु जब वही रूढ़ि हमारे हितों में बाधा बनती है तो हम उसे अंधविश्वास और रूढ़ि का नाम देने को मजबूर हो जाते हैं।वस्तुतः हर युग में शातिर लोग कुछ ऐसी परम्पराओं जो उनके व्यावसायिक होतों की साधक होती हैं , को समाज के सामने एक अपरिहार्य प्रथा या परम्परा के रूप में दृढ़ करते हैं । ऐसे समान हितों वाले एक बड़े वर्ग की इस षड्यंत्र में सम्मिलित भूमिका होती है । और सामान्य वर्ग हमेशा की भाँति कठपुतली की तरह उनके इशारों पर नाचने लगता है । प्राचीन काल में जनमत निर्माण का साधन ब्राह्मण वर्ग था जिन्हें शासकीय संरक्षण प्राप्त था ;जो वो कहते थे वही सारे समाज के लिए अनुकरणीय बन जाता था जिसे आप क़ानून भी कह सकते हैं क्योंकि क़ानून के उल्लंघन करने की भाँति इन जबरन थोपीं गयी परम्पराओं को न मानने पर कड़ी सजाएँ भी दी जाती थी।परिणामतः जल्दी ही ये परम्पराएँ रूढ़ियों के रूप में स्थापित हो जाती थी । स्थिति आज भी अधिक भिन्न नहीं है बस जनमत निर्माण का साधन बदला है। यूँ कहिए कि रूढ़ियों को गढ़ने का औज़ार पहले की अपेक्षा और अधिक तेज़ हो गया है । अब जनमत निर्माण का कार्य बिकाऊ मीडिया करता है क्योंकि यह मीडिया या तो उन लोगों से इसकी एवज़ में अपने लिए बहुत सा धन या सुविधाएँ लेता है या फिर ऐसा भी होता है कि उसके अपने हित भी इसी रूढ़िवादी सोच को प्रचारित करने में निहित हों।
बहरहाल जो भी है इतना सही है कि जब तक व्यक्ति धर्मभीरू बना रहेगा तब तक धर्म का लबादा औढ़े अधार्मिक लोग इसी तरह से परम्परा और धर्म का नाम लेकर लोगों से लाखों अत्याचार करने के उपरांत भी अपने लिए समर्थन जुटाते रहेंगे और अपनी ज़्यादतियों को वैध क़रार देते रहेंगे ।
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सही कहा जी। मानवीय उन्नति का लक्ष्य बुद्धि का विकास है, न कि शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कुटिल नीतियों का प्रयोग करके स्वार्थ सिद्धि करना। मानवीय फितरत है कि उसे हर समय हर चीज कुछ न कुछ चाहिए। चाहे वह भौतिक पदार्थ के रूप में हो या मोक्ष रुपी मुक्ति के रूप में। इसी कड़ी में यह सब रूढ़ियाँ नीतियां आती हैं जो स्वार्थ के एक साधन ही हैं।
Sahi kaha sir…nice thought
जीवन का एक सत्य जिसके बारे मे सब पता होते हुए भी हम सवीकार नही कर पाते
Aise hi vichar samaj ka margdarshan karenge.