आहार श्रृंखला (Food Chain) उस क्रम को कहते हैं जिसमें जीव-जंतु एक-दूसरे को भोजन के रूप में उपयोग करते हैं। यह प्रकृति में ऊर्जा और पोषक तत्वों के स्थानांतरण को दर्शाती है। एक आहार श्रृंखला आमतौर पर उत्पादकों (जैसे पौधे) से शुरू होती है, जो सूर्य की ऊर्जा का उपयोग करके भोजन बनाते हैं, और फिर विभिन्न स्तरों के उपभोक्ताओं (जैसे शाकाहारी, मांसाहारी और सर्वाहारी जीव) तक जाती है।
उदाहरण : पौधा → घास का टिड्डा → मेंढक → साँप → बाज |
यहाँ पौधा उत्पादक है। टिड्डा प्राथमिक उपभोक्ता है (शाकाहारी)। मेंढक द्वितीयक उपभोक्ता है (मांसाहारी)।साँप तृतीयक उपभोक्ता है। बाज शीर्ष उपभोक्ता है।
प्रत्येक स्तर पर, ऊर्जा एक जीव से दूसरे जीव में स्थानांतरित होती है, और यह श्रृंखला पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
आहार श्रृंखला के प्रमुख घटक
(1) उत्पादक (Producers): हरे पौधे उत्पादक हैं| ये सूर्य के प्रकाश से अपना भोजन बनाते हैं।
(2) उपभोक्ता (Consumers): उपभोक्ता अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते ये अपने भोजन के लिये पौधों व अन्य जीवों पर निर्भर रहते हैं | ये तीन प्रकार के होते हैं :
(i) शाकाहारी (Herbivores): पौधों व पौधों से मिलने वाले उत्पादों को खाने वाले जीवों को शाकाहारी ( Herbivores) कहते हैं | जैसे—हिरण, गाय।
(ii) मांसाहारी (Carnivores): अन्य जंतुओं को खाने वाले जीवों को मांसाहारी ( Carnivores) कहते हैं | जैसे—शेर, बाज।
(iii) सर्वाहारी (Omnivores): पौधे और जंतु दोनों को खाने वाले जीवों को सर्वाहारी ( Omnivores) कहते हैं | जैसे—मनुष्य, कौआ।
(3) अपघटक (Decomposers): जीवों के मृत अवशेषों को खाकर अपना भोजन प्राप्त करने वाले सूक्ष्म जीवों को अपघटक ( Decomposers ) कहते हैं | ये पोषक तत्त्वों को मिट्टी में मिलाते हैं | जैसे—कवक, जीवाणु।
आहार श्रृंखला की विशेषताएँ
आहार श्रृंखला ( Food Chain ) की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :
(1) ऊर्जा प्रवाह का क्रमिक मार्ग:
आहार श्रृंखला सूर्य की ऊर्जा से शुरू होती है, जिसे पौधे (उत्पादक) प्रकाश संश्लेषण द्वारा ग्रहण करते हैं और फिर यह ऊर्जा विभिन्न जीवों में स्थानांतरित होती है।
(2) पोषण स्तरों (Trophic Levels) में विभाजन:
आहार श्रृंखला में के पोषण स्तर इस प्रकार होते हैं :
उत्पादक >प्राथमिक उपभोक्ता >द्वितीयक उपभोक्ता >तृतीयक उपभोक्ता >अपघटक |
. उत्पादक (Producer): पौधे या फाइटोप्लैंकटन सबसे निचले स्तर पर होते हैं |
. प्राथमिक उपभोक्ता (Primary Consumer): शाकाहारी जैसे—गाय, टिड्डा दूसरे स्तर पर होते हैं |
. द्वितीयक उपभोक्ता (Secondary Consumer): शाकाहारी के बाद छोटे मांसाहारी जैसे—मेंढक, छोटी मछली आदि आते हैं।
. तृतीयक उपभोक्ता (Tertiary Consumer): चौथे स्तर पर बड़े मांसाहारी जैसे—साँप, शेर आदि आते हैं।
. अपघटक (Decomposers): कवक और जीवाणु अंत में मृत जीवों को विघटित करते हैं।
(3) ऊर्जा का 10% नियम:
आहार श्रृंखला में 90% ऊर्जा का ह्रास हो जाता है और केवल 10% ऊर्जा ही अगले स्तर तक पहुँचती है, शेष ऊर्जा श्वसन, उपापचय आदि में उपयोग हो जाती है।
(4) ऊर्जा का एकदिशीय प्रवाह (Unidirectional Flow):
आहार श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह हमेशा उत्पादक>उपभोक्ता>अघटक की दिशा में होता है, उल्टा नहीं।
(5) संक्षिप्त लंबाई:
अधिकांश आहार श्रृंखलाएँ 3-5 पोषण स्तरों तक ही सीमित होती हैं क्योंकि प्रत्येक स्तर पर ऊर्जा की उपलब्धता कम होती जाती है। तीन या चरणों की आहार श्रृंखला अच्छी मानी जाती है |
(6) प्राकृतिक संतुलन में भूमिका:
आहार श्रृंखला की प्राकृतिक संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है | यह पारिस्थितिकी तंत्र में जीवों की संख्या और ऊर्जा वितरण को नियंत्रित करती है।
आहार श्रृंखला का महत्व ( Importance of Food Chain )
आहार श्रृंखला (Food Chain) पारिस्थितिकी तंत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह जीवों के बीच ऊर्जा और पोषक तत्वों के स्थानांतरण को दर्शाती है, जो प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इसके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
(1) ऊर्जा का प्रवाह: आहार श्रृंखला सूर्य से प्राप्त ऊर्जा को उत्पादकों (जैसे पौधों) से उपभोक्ताओं (जैसे जानवरों) और फिर अपघटकों तक पहुंचाती है। यह प्रक्रिया पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा के संचरण को सुनिश्चित करती है।
(2) पारिस्थितिक संतुलन: यह विभिन्न प्रजातियों के बीच संतुलन बनाए रखती है। यदि किसी एक स्तर (जैसे शिकारी या शिकार) में असंतुलन होता है, तो यह पूरी श्रृंखला और पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकता है।
(3) जैव-विविधता का संरक्षण: आहार श्रृंखला विभिन्न जीवों की भूमिकाओं को स्पष्ट करती है, जिससे उनकी महत्ता समझ में आती है और जैव विविधता को संरक्षित करने में मदद मिलती है।
(4) प्राकृतिक संतुलन: यह प्रजातियों की संख्या को नियंत्रित करती है। उदाहरण के लिए, शिकारियों की मौजूदगी शाकाहारी जीवों की आबादी को नियंत्रित करती है, जिससे वनस्पति पर अत्यधिक दबाव नहीं पड़ता।
(5) मानव जीवन से संबंध: मनुष्य भी आहार श्रृंखला का हिस्सा है। कृषि, मछली पालन और पशुपालन जैसी गतिविधियाँ इस पर निर्भर करती हैं, जो हमारे भोजन और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं।
संक्षेप में, आहार श्रृंखला ( Food Chain ) पारिस्थितिकी तंत्र ( Ecosystem ) की स्थिरता और जीवन के अस्तित्व के लिए आधारभूत है। इसके बिना प्राकृतिक चक्र बाधित हो सकता है, जिसका प्रभाव सभी जीवों पर पड़ता है। मनुष्य भी इस अछूता नहीं |