पल्लवन : अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं और नियम ( Pallavan : Arth, Paribhasha, Visheshtayen Aur Niyam )

पल्लवन किसी भाव का विस्तार है जो उसे समझने में सहायक सिद्ध होता है | विद्वान, संत-महात्मा आदि समास -शैली और प्रतीकात्मक शब्दों का प्रयोग करते हुए ऐसी गंभीर बात कह देते हैं जो उनके लिए तो सहज-सरल होती है पर सामान्य व्यक्ति के लिए उसके भाव को समझने में कठिनाई होती है | ऐसे वाक्यों को पल्लवन की सहायता से स्पष्ट किया जाता है | ऐसे सूत्रात्मक वाक्यों के भाव को स्पष्टता प्रदान करने के लिए विस्तृत व्याख्यात्मक प्रस्तुति की जाती है | प्रायः नीति-वाक्य, सूत्र-वाक्य, कहावतों आदि का पल्लवन किया जाता है |

पल्लवन का अर्थ व परिभाषा ( Pallavan Ka Arth V Paribhasha )

पल्लवन शब्द का शाब्दिक अर्थ है – विस्तार या फैलाव | यह अंग्रेजी शब्द Expansion का पर्याय हैं | इसके अंतर्गत किसी शब्द, सूक्ति, उद्धरण, लोकोक्ति आदि को दृष्टांतों व उदाहरणों आदि की सहायता से विस्तार प्रदान किया जाता है | यह संक्षेपण का विपरीतार्थक शब्द है | इसमें किसी विषय की विस्तृत विवेचना की जाती है ताकि उस सूत्र-वाक्य में छिपे हुए गहन भाव को सरलता से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके |

अतः गहन भावों से युक्त सूत्रात्मक- वाक्य का विस्तार करना ही पल्लवन है |

डॉ नरेश मिश्र के शब्दों में : – “किसी भाव-गुम्फित सूत्रात्मक-वाक्य को साधारण व्यक्ति के लिए बोधगम्य बनाने हेतु किए जाने वाले विस्तार को पल्लवन की संज्ञा दी जाती है |”

पल्लवन और व्याख्या में अंतर ( Pallavan Aur Vyakhya Me Antar )

प्रथम दृष्टि में पल्लवन और व्याख्या एक-दूसरे के पर्याय प्रतीत होते हैं परंतु दोनों में पर्याप्त अंतर है | पल्लवन में नीति-वाक्य, सूत्र-वाक्य, लोकोक्ति आदि के भाव का विस्तार होता है | इसमें केवल मूल-भाव व निहित प्रसंगों का विस्तार किया जाता है जब की व्याख्या में मूल-भाव व निहित प्रसंगों के विस्तार के साथ-साथ उनकी आलोचना व टीका-टिप्पणी की भी स्वतंत्रता होती है | पल्लवन में ऐसी स्वतंत्रता नहीं होती | पल्लवन में संदर्भ और प्रसंग की योजना का महत्व होता है जबकि व्याख्या में विशेष तथ्यों को अलग से स्पष्ट किया जा सकता है |

पल्लवन की विशेषताएं या गुण ( Pallavan Ki Visheshtayen Ya Gun )

1. स्पष्टता

पल्लवन में दिए गए विषय के कथ्य के प्रतिपादन में स्पष्टता का गुण अनिवार्य है | अच्छी प्रकार से चिंतन-मनन करने के पश्चात उस की ऐसी रूपरेखा बनाई जाती है कि उसमें कहीं भी विषयांतर की संभावना नहीं रहती | मूल-भाव को उदाहरणों की सहायता से स्पष्ट किया जाता है |

2. संक्षिप्तता का गुण

यह सही है कि पल्लवन में सूत्र-वाक्य का विस्तार किया जाता है लेकिन यह विस्तार अनावश्यक नहीं होना चाहिए | इसमें व्यर्थ की टीका टिप्पणी और तर्क वितर्क का कोई स्थान नहीं होता | विरोधी विचारों, उदाहरणों और तर्कों को कोई स्थान नहीं दिया जाना चाहिए |

3. सरलता

पल्लवन में सरलता का गुण होना चाहिए | छोटे-छोटे सरल वाक्य और सटीक शब्द प्रयुक्त करने चाहिए | जानबूझकर अलंकारों का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे व्यर्थ का विस्तार तो होता ही है साथ ही पाठकों के लिये पल्लवन कठिन हो जाता है और पल्लवन का मूल उद्देश्य खो जाता है |

4. अन्य पुरुष शैली का प्रयोग

पल्लवन में उत्तम और मध्यम पुरुष के स्थान पर अन्य पुरुष का प्रयोग किया जाता है | अन्य पुरुष शैली का प्रयोग करने से पल्लवन में सरलता, सहजता और प्रवाहमयता का गुण आ जाता है |

5. कथ्य और शिल्प का सुव्यवस्थित रूप

पल्लवन में कथ्य और शिल्प का सुव्यवस्थित रूप प्रस्तुत किया जाता है | पल्लवन का अर्थ केवल एक-एक शब्द के अर्थ को समझाना नहीं बल्कि निहित भाव व प्रसंगों को सुव्यवस्थित रुप से पाठकों के समक्ष लाना है | शब्द-चयन तथा वाक्य-संरचना सरल और सटीक होनी चाहिए |

6. आलोचना व टीका-टिप्पणी का निषेध

पल्लवन में निहित प्रसंगों, विचारों और कथ्य का विस्तार किया जाता है परन्तु इसमें निहित प्रसंगों, विचारों व कथ्य की आलोचना या समीक्षा नहीं की जाती | ऐसा करने से मूल विषय से भटकाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और पल्लवन में अनावश्यक विस्तार आ जाता है |

पल्लवन-प्रक्रिया के नियम ( Pallavan Prakriya Ke Niyam )

सामान्यतः पल्लवन प्रक्रिया के निम्नलिखित नियमों का प्रयोग करके पल्लवन-प्रक्रिया में प्रवीणता प्राप्त की जा सकती है : –

(1) जिस नीति-वाक्य, सूत्र-वाक्य, लोकोक्ति आदि का पल्लवन करना हो उस पर भली-भांति विचार करते हुए उसका भाव हृदयंगम कर लेना चाहिए | प्रत्येक शब्द के अर्थ को भली प्रकार से समझ लेना चाहिए तथा उससे संबंधित उदाहरण सोच लेने चाहिए |

(2) मूल भाव के साथ-साथ सहयोगी विचारों को भी महत्व देना चाहिए | यदि आवश्यक प्रतीत हो तो उन्हें किसी कागज पर लिख लेना चाहिए ताकि एक व्यवस्थित क्रम में उन्हें पल्लवन में स्थान दिया जा सके | अनावश्यक विचारों को छोड़कर उपयोगी विचारों को पल्लवन में स्थान देना चाहिए |

(3) पल्लवन के लिए एक प्रारूप अपने मन में तैयार कर लेना चाहिए | छोटे-छोटे वाक्यों में केंद्रीय भाव के साथ-साथ सहयोगी भावों को स्थान देना चाहिए |

(4) पल्लवन करते समय आकार और शब्द-सीमा का ध्यान रखना चाहिए | यह सही है कि पल्लवन में हम दी गई लोकोक्ति, सूत्र-वाक्य आदि का विस्तार करते हैं लेकिन यह विस्तार अनावश्यक नहीं होना चाहिए | पल्लवन के आकार का कोई निश्चित नियम तो नहीं है पर इसे 150 से 250 शब्दों के बीच अच्छा माना जाता है | यदि आवश्यक हो तो एक के बाद दूसरे अनुच्छेद का प्रयोग किया जा सकता है |

(5) पल्लवन का आरंभ और अंत विशेष रूप से प्रभावशाली होना चाहिए | लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पल्लवन में मध्य का भाग महत्वपूर्ण नहीं है | मध्य के भाग में दिए गए उदाहरण ही मूल भाव और सहायक भावों को स्पष्टता प्रदान करते हैं |

(6) अप्रासंगिक, अनावश्यक और व्यर्थ बातों को त्याग कर मूल भाव को आधार बनाना चाहिए |

(7) पल्लवन में किसी भाव, विचार या कथ्य की आलोचनात्मक-समीक्षात्मक प्रवृत्ति निषेध है |

(8) पल्लवन की भाषा सरल, सहज और विषयानुकूल होनी चाहिए | अलंकृत और परिनिष्ठित भाषा का प्रयोग आवश्यक नहीं है |

(9) वर्तनी, वाक्य-विन्यास, विराम-चिह्न और व्याकरणिक नियमों को ध्यान में रखना चाहिए |

(10) पल्लवन लिख लेने के पश्चात उसे एक बार फिर से पढ़ना चाहिए यदि उसमें कुछ त्रुटियां दिखाई दे जाती हैं तो उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए |

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