जयद्रथ वध ( Jaydrath Vadh ) : मैथिलीशरण गुप्त ( सप्रसंग व्याख्या )

जयद्रथ वध ( मैथिलीशरण गुप्त ) : व्याख्या

उन्मत्त विजयोल्लास से, सब लोग मत-गयन्द-से,

राजा युधिष्ठिर के निकट पहुंचे बड़े आनंद से |

देखा युधिष्ठिर ने उन्हें जब, जान ली निज जय तभी,

सुख-चिन्ह से ही चित्त की बुध जान लेते हैं सभी ||

तब अर्जुनादिक ने उन्हें बढ़कर प्रणाम किया वहां,

सिर पर उन्होंने हाथ रख सुख दिया और लिया वहां |

सब लोग उनको घेर कर थे उस समय उत्सुक खड़े,

बोले युधिष्ठिर से स्वभू, सुंदर सुमन मानो झड़े ||

“हे तात ! जीत हुई तुम्हारे, पुण्य-पूर्ण प्रताप से,

रण में जयद्रथ-वध हुआ, छूटे धनंजय ताप से |

तुमने इन्हें सौंपा सबेरे था हमारे हाथ में

सो लीजिये अपनी धरोहर, सुख-सुयश के साथ में ||” (1)

प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश हमारी हिंदी ( बी ए तृतीय सेमेस्टर ) की पाठ्यपुस्तक ‘आधुनिक हिंदी कविता’ में संकलित कविता ‘जयद्रथ वध’ से अवतरित है | इस कविता के रचयिता राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी हैं | इन पंक्तियों में अर्जुन द्वारा जयद्रथ वध के पश्चात् पांडवों की ख़ुशी का वर्णन किया गया है |

व्याख्या – कवि का कथन है कि जयद्रथ वध के पश्चात अर्जुन व श्री कृष्ण सहित समस्त पांडव सैनिक किसी मस्त हाथी की भांति विजयोल्लास से उन्मत्त होकर बड़े आनंदपूर्वक महाराजा युधिष्ठिर के पास पहुंचे | राजा युधिष्ठिर ने उनकी मुख्य मुद्रा को देखकर ही अपनी विजय का अनुमान लगा लिया क्योंकि प्रायः लोग दूसरे के चेहरों पर सुख चिह्न को देखकर ही उनके हृदय की स्थिति को भांप जाते हैं |

अर्जुन आदि वीरों ने आगे बढ़कर महाराज युधिष्ठिर का अभिवादन किया | युधिष्ठिर ने उनके सिर पर अपने आशीर्वाद का हाथ रखकर उन्हें सुख प्रदान किया और स्वयं भी सुख प्राप्त किया | सभी लोग उस समय युधिष्ठिर को उत्सुकता से घेरे खड़े थे | उसी समय श्री कृष्ण ( स्वभू ) युधिष्ठिर से कुछ कहने लगे तो मानों सुंदर फूल झड़ने लगे |

श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को संबोधित करते हुए कहने लगे – हे भाई ! आज के युद्ध में तुम्हारे पुण्य-प्रताप से तुम्हारी विजय हुई | युद्ध में जयद्रथ मारा गया | इस प्रकार अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की और प्रतिज्ञा पूर्ण न होने की स्थिति में होने वाले अहित से बच गये | तुमने आज सुबह आज अर्जुन को हमारे हाथों में सौंपा था ; अतः आप अपनी धरोहर सुख और यश के साथ संभाल लीजिये |

विशेष – (1) जयद्रथ वध के पश्चात् पांडवों की मन:स्थिति का सजीव वर्णन किया गया है |

(2) संवादात्मक शैली है |

(3) अनुप्रास व अन्त्यानुप्रास अलंकार की सुन्दर छटा है |

(4) तत्सम-तद्भव शब्दावली का समन्वय है |

(5) भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहमयी है |

सुनकर मधुर घन-शब्द को पाते प्रमोद मयूर ज्यों,

श्रीकृष्ण के सुन वचन सबको, सुख हुआ भरपूर त्यों |

राजा युधिष्ठिर हर्ष से, सहसा न कुछ भी कह सके,

थे भक्ति के गुरु-भार से, मानो वचन उनके थके | |

“साक्षात चराचरनाथ, तुम रखते स्वयं जब हो दया,

आश्चर्य क्या फिर जो जयद्रथ युद्ध में मारा गया?

तो भी इसे सुनकर ह्रदय में, सुख समाता है नहीं,

साधन-सफलता-सुख-सदृश्य, सुख दृष्टि आता है नहीं ||”

बहु विज्ञ तत्त्वज्ञानियों ने बात यह मुझसे कही –

माधव ! तुम्हें जो इष्ट होता सर्वदा होता वही |

अज्ञानता से मूर्ख जन मानव तुम्हें हैं मानते,

ज्ञानी, विवेकी, विज्ञवर, विश्वेश तुमको जानते || (2)

प्रसंग – पूर्ववत |

व्याख्या – कभी कहता है कि श्री कृष्ण के इन वचनों को सुनकर सबके मन में वैसा ही आनंद का भाव उत्पन्न हुआ जैसा सुख और आनंद बादलों की मधुर ध्वनि को सुनकर मोरों को प्राप्त होता है | महाराज युधिष्ठिर प्रसन्नता की अधिकता के कारण कुछ भी नहीं बोल सके | ऐसा लगता था मानो श्री कृष्ण के प्रति अपने भक्ति भाव के कारण उनके वचन थक गए हों |

जब अर्जुन श्रीकृष्ण व अन्य पांडवों ने युधिष्ठिर को जयद्रथ वध का समाचार सुनाया तो युधिष्ठिर अत्यंत प्रसन्न हुए और गदगद होकर श्री कृष्ण से कहने लगे कि हे चर और अचर के स्वामी ! जब आप स्वयं हम पर अपनी कृपा रखते हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि आज के युद्ध में जयद्रथ मारा गया है | परंतु फिर भी हे प्रभु ! यह समाचार सुनकर मेरे हृदय में सुख नहीं समा पा रहा है | साधन रूपी सफलता से प्राप्त सुख के समान मुझे यह सुख दृष्टिगत नहीं हो रहा है | कहने का भाव यह है कि हमारे लिए जयद्रथ वध साधन नहीं बल्कि साध्य बन गया था |

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे श्रीकृष्ण ! बहुत सी बातों के जानकार तथा तत्वज्ञानियों ने मुझे यह बात कही है कि संसार में हमेशा वही होता है जिसकी आप इच्छा करते हैं | अज्ञानता के कारण मूर्ख लोग तुम्हें साधारण मनुष्य समझते हैं परंतु ज्ञानी, विवेकी और बुद्धिमान लोग तो तुम्हें विश्व के स्वामी अर्थात भगवान के रूप में ही जानते हैं |

विशेष – (1) जयद्रथ वध के पश्चात् पांडवों की मन:स्थिति का सजीव वर्णन किया गया है |

(2) श्री कृष्ण की महत्ता का वर्णन किया गया है |

(3) संवादात्मक शैली है |

(4) अनुप्रास व अन्त्यानुप्रास अलंकार की सुन्दर छटा है |

(5) तत्सम-तद्भव शब्दावली का समन्वय है |

(6) भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहमयी है |

जो कुछ किया तुमने स्वयं, हे देव-देव ! हुआ वही,

जो कुछ करोगे तुम स्वयं, आगे वही होगा सही |

जो कुछ स्वयं तुम कर रहे हो, हो रहा अब है तथा,

हैं हेतु मात्र सदैव हम, कर्त्ता तुम्हीं हो सर्वथा ||

हो निर्विकार तथापि तुम, हो भक्तवत्सल सर्वदा,

हो तुम निरीह तथापि अद्भुत सृष्टि रचने हो सदा |

आकार हीन तथापि तुम साकार संतत सिद्ध हो,

सर्वेश होकर भी सदा, तुम प्रेम वश्य प्रसिद्ध हो | |

करते तुम्हारा ही मनन, मुनि रत तुम्हीं में ऋषि सभी,

संतत तुम्हीं को देखते, है ध्यान में योगीन्द्र भी |

विख्यात वेदो में विभो ! सबके तुम्हीं आराध्य हो,

कोई न तुमसे है बड़ा, तुम एक सबके साध्य हो || (3)

प्रसंग – पूर्ववत |

व्याख्या – जयद्रथ वध के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए युधिष्ठिर कहते हैं कि हे देवों के देव श्री कृष्ण ! आपने जो कुछ किया है संसार में वही कार्य हुआ है | आगे भी आप संसार में जो कुछ करोगे वही सही होगा | इस समय भी आप जो कुछ कर रहे हो वही हो रहा है | हे प्रभु ! हम सब तो केवल निमित्त मात्र हैं सब कुछ करने वाले कर्त्ता तो आप ही हैं |

हे प्रभु ! तुम विकाररहित हो लेकिन सदैव अपने भक्तों पर कृपा करते हो | तुम अत्यंत साधारण हो परन्तु फिर भी अद्भुत सृष्टि की रचना करते हो | यद्यपि तुम आकार हीन हो परन्तु फिर भी साकार रूप में निरंतर सिद्ध हो | हे प्रभु ! तुम सब के स्वामी हो लेकिन फिर भी सदैव प्रेम के वश में होने वाले के रूप में प्रसिद्ध हो |

हे प्रभु ! सभी ऋषि-मुनि अपने मन में हमेशा तुम्हारा ही स्मरण करते हैं और सदैव तुझ में ही तल्लीन रहते हैं | ध्यानरत्त रहने वाले सभी योगीजन भी अपने ध्यान में निरंतर तुम्हीं को देखते रहते हैं | हे प्रभु ! वेदों में तुम्हारा वैभव विख्यात है | तुम सभी के आराध्य हो | कोई भी तुम से बड़ा नहीं है | तुम सभी के साध्य हो अर्थात हर कोई तुम्हें पाना चाहता है |

विशेष — (1) इन पंक्तियों में युधिष्ठिर का श्री कृष्ण के प्रति भक्ति-भाव प्रकट हुआ है |

(2) श्री कृष्ण को ब्रह्म रूप में चित्रित किया गया |

(3) संवादात्मक शैली है |

(4) अनुप्रास व अन्त्यानुप्रास अलंकार है |

(4) तत्सम-तद्भव शब्दों का सुंदर समन्वय है |

(5) भाषा सरल, सहज़ एवं प्रवाहमयी है |

पाकर तुम्हें फिर और कुछ, पाना न रहता शेष है ;

पाता न जब तक जीव तुमको, भटकता सविशेष है |

जो जन तुम्हारे पद-कमल के, असल मधु को जानते,

वे मुक्ति को भी कर अनिच्छा, तुच्छ उसको मानते ||

हे सच्चिदानंद प्रभो ! तुम नित्य सर्व सशक्त हो |

अनुपम, अगोचर, शुभ, परात्पर, ईश-वर अव्यक्त हो |

तुम ध्येय, अज्ञेय, अजेय, निज भक्त पर अनुरक्त हो,

तुम भवविमोचन, पद्य-लोचन, पुण्य, पद्मासक्त हो || (4)

प्रसंग – पूर्ववत |

व्याख्या – जयद्रथ वध के पश्चात युधिष्ठिर श्री कृष्ण की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु इस संसार के समस्त जन तुम्हें पाने का प्रयास कर रहे हैं | जो तुम्हें प्राप्त कर लेता है उसके लिए इस संसार में और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता और जो व्यक्ति प्रयास करने के बावजूद पीठ में प्राप्त नहीं कर पाता वह इस संसार में विशेष रुप से भटकता रहता है | जो व्यक्ति तुम्हारे चरण-कमलों के वास्तविक मधु को पहचानते हैं, वे उसे छोड़कर मोक्ष की भी कामना नहीं करते क्योंकि उन्हें मोक्ष भी तुम्हारे चरण-कमलों के मधु की तुलना तुच्छ लगता है |

श्री सच्चिदानंद स्वरूप ईश्वर ! तुम नित्य तथा सर्वशक्तिमान हो | हे प्रभु तुम अनुपम, अगोचर, शुभ, परात्पर, देवताओं में श्रेष्ठ तथा अव्यक्त हो | हे प्रभु तुम अपने भक्तों के लिये ध्येय तथा गेय हो अर्थात तुम्हारे भक्त केवल तुम्हारी प्राप्ति का ध्येय रखते हैं तथा तुम्हारी प्रशस्ति के गीत गाते हैं | हे प्रभु ! तुम भक्तों के सांसारिक दुखों को का हरण करने वाले हो | तुम कमल के समान नेत्रों वाले, पुण्य तथा शक्तिशाली हो |

विशेष – (1) युधिष्ठिर का श्री कृष्ण के प्रति भक्ति भाव प्रकट होता है |

(2) श्री कृष्ण को ब्रह्म रूप में चित्रित किया गया है |

(3) अनुप्रास, अन्त्यानुप्रास, रूपक आदि अलंकारों का सुंदर प्रयोग है |

(4) वर्णनात्मक शैली में श्री कृष्ण के गुणों का वर्णन किया गया है |

(5) तत्सम-तद्भव शब्दावली का सुंदर समन्वय है परंतु तत्सम शब्दावली की प्रधानता है |

(6) भाषा सरल सहज एवं प्रवाहमयी है |

तुम एक होकर भी अहो ! रखते अनेकों वेश हो,

आद्यन्त-हीन, अचिन्त्य, अद्भुत, आत्म-भू, अखिलेश हो |

कर्त्ता तुम्हीं, भर्त्ता तुम्हीं, हर्त्ता तुम्हीं हो सृष्टि के,

चारों पदार्थ दयानिधे ! फल हैं तुम्हारी दृष्टि के ||

हे ईश ! बहु उपकार तुमने, सर्वदा हम पर किए,

उपहार प्रत्युपकार में क्या, दें तुम्हें इसके लिए?

है क्या हमारा सृष्टि में? यह सब तुम्हीं से है बनी,

संतत ऋणी हैं हम तुम्हारे, तुम हमारे हो धनी || ( 5)

प्रसंग – पूर्ववत |

व्याख्या – हे प्रभु ! तुम एक हो लेकिन तुम एक होते हुए भी अनेक रूप रखते हो | हे प्रभु ! तुम आरंभ तथा अंत से रहित हो, अचिंत्य, विचित्र, स्वयंभू तथा सृष्टि के स्वामी हो | तुम्हीं इस सृष्टि के सृजनकर्त्ता तथा पालनहार हो | धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चारों पदार्थ तुम्हारी ही सृष्टि के फल हैं |

जयद्रथ वध के पश्चात कृष्ण की स्तुति करते हुए महाराज युधिष्ठिर कहते हैं कि हे प्रभु ! तुमने हम पर सदैव बहुत से उपचार किए हैं, हमारी समझ में नहीं आता है कि इन उपकारों के बदले में उपहार स्वरूप हम तुम्हें क्या भेंट करें क्योंकि इस सृष्टि में हमारा कुछ भी नहीं है इस सृष्टि में जो कुछ भी विद्यमान है वह सब कुछ तुम्हारी ही रचना है | हे प्रभु ! हम निरंतर आपके ऋणी हैं, आप हमारे स्वामी हो |

विशेष – (1) युधिष्ठिर का श्री कृष्ण के प्रति भक्ति भाव प्रकट किया गया है |

(2) श्री कृष्ण को ब्रह्म रूप में चित्रित किया गया है |

(3) वर्णनात्मक शैली में श्री कृष्ण के गुणों का वर्णन है |

(4) अनुप्रास और अन्त्यानुप्रास अलंकारों की सुंदर छटा है |

(5) तत्सम प्रधान शब्दावली है |

(6) भाषा सरल, सहज विषयानुकूल एवं प्रवाहमयी है |

जय दीनबंधो, सौख्य-सिन्धों, देव-देव दयानिधे,

जय जन्म-मृत्यु विहीन शाश्वत, विश्व-वन्द्य, महाविधे |

जय पूर्ण-पुरुषोत्तम, जनार्दन, जगन्नाथ, जगद्गते,

जय-जय विभो, अच्युत हरे, मंगलते, मायापते !

कहते हुए यों नृप युधिष्ठिर, मुग्ध होकर रुक गए,

तत्क्षण अचेत समान फिर, प्रभु के पदों में झुक गए |

बढ़ कर उन्हें हरि ने हृदय से, हर्ष युक्त लगा लिया,

आनंद से सत्प्रेम का, मानो शुभालिंगन किया || (6)

प्रसंग – पूर्ववत |

व्याख्या – जयद्रथ वध के पश्चात् राजा युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे दीन-दुखियों के सहायक, सुखों के सागर, देवों के देव दया के सागर तुम्हारी सदा ही जय हो | जन्म और मृत्यु से विहीन, शाश्वत, विश्व के द्वारा वंदनीय, महान प्रकाश स्वरूप ईश्वर तेरी सदा ही जय हो | पुरुषों में उत्तम, जन-हितैषी, जगत-स्वामी तथा जगत में रमण करने वाले ईश्वर तुम्हारी जय हो | हे प्रभु, हे अक्षय, मंगलदायक, माया के स्वामी तुम्हारी जय हो |

युधिष्ठिर प्रभु श्री कृष्ण की स्तुति करते हुए कुछ श्री कृष्ण को देख कर मुग्ध हो कुछ देर के लिये रुक जाते हैं तत्पश्चात अचेत समान प्रभु के चरणों में झुक जाते हैं | प्रभु श्री कृष्ण ने प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़कर उन्हें गले से लगा लिया | इस प्रकार मानो आनंद और प्रेम का शुभ मिलन हुआ |

विशेष – (1) युधिष्ठिर का श्री कृष्ण के प्रति भक्ति भाव प्रकट होता है |

(2) श्री कृष्ण को ब्रह्म रूप में चित्रित किया गया है |

(3) वर्णनात्मक शैली है |

(4) अनुप्रास एवं अन्त्यानुप्रास अलंकार है |

(5) तत्सम प्रधान शब्दावली है |

(6) भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहमयी है |

वह भक्त का भगवान से, मिलना नितांत पवित्र था,

प्रत्यक्ष ईश्वर-जीव का संगम अति विचित्र था |

मानो सुकृत आकर स्वयं ही शील से, थे मिल रहे,

युग श्याम-गौर सरोज मानो साथ ही थे खिल रहे ||

करने लगे सब लोग तब आनंद से जयनाद यों,

त्रौलौक्य को हों दे रहे निर्भय विजय-संवाद ज्यों |

अन्यत्र दुर्लभ है भुवन में, बात यों उत्कर्ष की,

सचमुच कहीं समता नहीं, है भव्य भारतवर्ष की ||

दु:ख दु:शलादिक का अभी कहना यद्यपि अवशिष्ट है,

पर पाठकों का जी दुखाना, अब न हमको इष्ट है |

कर बार-बार क्षमार्थना होते विदा अब हम यहीं,

सुख के समय दुख की कथा अच्छी नहीं लगती कहीं || (7)

प्रसंग – पूर्ववत |

व्याख्या – कवि का कथन है कि भगवान श्री कृष्ण तथा राजा युधिष्ठिर का यह मिलन एक भक्त और भगवान का नितांत पवित्र मिलन है | प्रत्यक्ष रुप से ईश्वर और साधारण जीव का यह मिलन अत्यंत विचित्र है | ऐसा लगता है मानो सत्कर्म स्वयं चलकर महान शील से मिल रहे हों | ऐसा लगता है मानो श्याम और गौर वर्ण के दो कमल एक साथ चल रहे हों |

इस अवसर पर सब लोग आनंद पूर्वक जय-जयकार की ध्वनि इस प्रकार करने लगे मानव वे तीनों लोकों में निर्भय होकर विजय का संदेश दे रहे हों | इस प्रकार के महान उत्कर्ष की बात इस संसार में अन्यत्र दुर्लभ है | सचमुच भव्य भारतवर्ष की कहीं कोई समानता नहीं है अर्थात भारतवर्ष संसार में महानतम है |

कवि कहता है कि दुख और पीड़ा प्रदान करने वाली घटनाओं ( दुःख -दु:शलादिक ) का वर्णन करना यद्यपि अभी बाकी है परंतु पाठकों का दिल दुखाना मेरा लक्ष्य नहीं है | अतः दुख की बातों का वर्णन न करने के लिए क्षमा करते हुए अब हम सभी यहां से विदा होते क्योंकि सुख के अवसर पर दुख की कथा कहीं भी अच्छी नहीं लगती |

विशेष – (1) श्री कृष्ण और युधिष्ठिर के मिलन का मार्मिक चित्रण किया गया है |

(2) अनुप्रास, अन्त्यानुप्रास, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का सुंदर प्रयोग है |

(3) तत्सम प्रधान शब्दावली है |

(4) भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहमयी है |

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