रसखान के पद एकनिष्ठ भक्ति और रसमयता के लिए प्रसिद्ध हैं | यहाँ हरियाणा के विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा निर्धारित बी ए प्रथम सेमेस्टर ( हिंदी ) पाठ्य पुस्तक ‘मध्यकालीन काव्य कुंज’ में संकलित रसखान के पद दिए गए हैं |

1
मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पशु हौं तो कहा बस मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन।।
पाहन हौं तौ वही गिरि को जो धार्यो कर छत्र पुरन्दर धारन। जो खग हौं तौ बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन।
2
या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवो निधि को सुख नन्द की गाइ चराइ बिसारौं।।
रसखानि कबौं इन आँखिन सों ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक रौ कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं ।।
3
मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं गुंज की माल गरे पहिरौंगी।
ओढ़ि पितम्बर लै लकुटी बन गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी ।।
भावतो वोहि मेरो रसखानि सों तेरे कहे सब स्वाँग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी।
4
कान्ह भए बस बाँसुरी के अब कौन सखी हमकों चहिहै।
निस द्यौस रहै सँग साथ लगी यह सौतिन तापन क्यौं सहिहै।
जिन मोहि लिया मनमोहन को रसखानि सदा हमकों दहिहै।
मिलि आओ सबै सखी भाग चलें अब तो ब्रज में बँसुरी रहिहै।।
5
लोक की लाज तजी तबहीं जब देख्यो सखी ब्रजचन्द सलोनो।
खंजन मीन सरोजन की छवि गंजन नैन लला दिन होनो।।
रसखानि निहारि सकें जु सम्हारि कै को तिय है वह रूप सुठोनो।
भौंह कमान सौं (जोहन) कों सब बेधत प्राननि नन्द को छौनो।।
6
धूर भरे अति शोभित स्याम जू तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
डोलत खात फिरै अँगना पग पैंजनी बाजती, पीरी कछोटी।।
वा छवि को रसखानि बिलोकत बारत काम-कला निज कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी।।
7
सोहत है चंदवा सिर मौर के जैसिये सुन्दर पाग कसी है।
तैसिये गोरज भाल बिराजति जैसी हिये बनमाल लसी है।।
रसखानि बिलोकत बौरी भई दृग पूँदि कै ग्वालि पुकारि हँसी है।
खोलि री पूँघट खोलौं कहा वह मूरति नैनन माँझ बसी है।
8
अँखियाँ अँखियाँ सों सकाय मिलाय हिलाय रिझाय हियो भरिबो।
बतियाँ चित चोरन चेटक सी रस चारु चरित्रन ऊँचरिबो।।
रसखानि के प्रान सुधा भरियो अधरान पै त्यों अधरा धरिबो।
इतने सब मैन के मोहनी जंत्र पै मंत्र बसीकर सी करिबो।।
9
जा दिन तें निरख्यो नन्दनन्दन कानि तजी घर बंधन छूट्यौ।
चारु बिलोकनि की निसि मार सम्हार गई मन मार न लूट्यौ।।
सागर को सरिता जिमि धावत रोकि रहे कुल को पुल टूट्यौ ।
मत्त भयो मन संग फिरै रसखानि सरूप सुधारस छूट्यौ ।।
10
कल कानन कुण्डल मोर पखा उर पैं बनमाल बिराजति है।
मुरली कर मैं अधरा मुसकानि तरंग महाछबि छाजति है।।
रसखानि लखै तन पीतपटा सत दामिनी की दुति लाजति है।
वह बाँसुरी की धुनि कान परें कुलकानि हियो तजि भाजति है।।
11
ब्रह्मा में ढूँढ्यो पुरानन गानन वेद रिचा सुनि चौगुने चायन।
देख्यो सुन्यो कबहूँ न कितूं वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन ।।
टेरत हेरत हारि पर्यो रसखानि बतायो न लोग लुगायन।
देखौ दुरो वह कुंजकुटीर मैं बैठो पलोटत राधिका पायन।।
12
सेस गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरन्तर गावें।
जाहि अनादि अनन्त अखण्ड अछेद अभेद सुबेद बता३।।
नारद से सुक व्यास रहैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावें।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भर छाछ पर नाच नचावें।।
13
जा दिन तें वह नन्द को छोहरो या बन धेनु चराइ गयो है।
मीठिही ताननि गोधन गावत बैन बजाइ रिझाइ गयो है।।
वा दिन सों कछु टोना सों के रसखानि हिये में समाइ गयो है।
कोउ न काहु की कानि करै सगरौ ब्रज बीर विकाइ गयो है।
14
गोरज बिराजै भाल लहलही बनमाल
आगै गैया पाछे ग्वाल गावै मृदु तान री।
तैसी धुनि बाँसुरी मधुर-मधुर तैसी
बंक चितवनि मंद मंद मुसकानि री।।
कदम विटप के निकट तटनी के आव
अटा चढ़ि चाहि पीतपट फहरानि री
रस बरसावै तन तपन बुझावै नैन
प्राननि रिझावै वह आवै रसखानि री।।
15
प्रान वही जु रहैं रिझि वा पर रूप वही लिहिं वाहि रिझायो।
सीस वही जिन वे परसे पद अंक वही जिन वा परसायो।।
दूध वही जु दुहायो री वाही दही सु सही जो वही ढरकायो।
और कहाँ लौं कहौं रसखानि री भाव वही जु वही मन भायो।।
16
बैन वही उनको गुन गाइ औ कान वही उन बैन सों सानी।
हाथ वही उन गात सरै अरु पाइ वही जु उही अनुजानी।।
जान वही उन प्रान के संग औ मान वही जु करै मनमानी।
त्यों रसखानि रसखानि जु हैं रसखानि सो है रसखानी।
17
लाय समाधि रहे बरम्हादिक जोगी भये पर अन्त न पावै।
साँझ ते भोरहिं भोर ते साँझनि सेस सदा नित नाम जपावें।
ढूँढ फिरे तिरलोक में साख सुनारद लै कर बीन बजावें।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भर छाछ पै नाच नचावें।।
18
एक सु तीरथ डोलत है इक बार हजार पुरान बके हैं।
एक लगे जप में तप में इक सिद्ध समाधिन में अटके हैं।।
चेत जु देखत हौ रसखान सु मूढ़ महा सिगरे भटके हैं।
साँचहि वे जिन आपुनपौ यह स्याम गुपाल पै वारि छके हैं।।
19
अति सुन्दर री ब्रजराजकुमार महामृदु बोलनि बोलत है।
लखि नैन की कोर कटाछ चलाइ कै लाज की गाँठन खोलत है।
सुनि री सजनी अलबेलो लला वह कुंजनि कुंजनि डोलत है।
रसखानि लखें मन बूड़ि गयौ मधि रूप के सिंधु कलोलत है।
20
चंदन खोर पै बिन्दु लगाय कै कुंजन तें निकस्यौ मुसकातो।
राजत है बनमाल गरे अरु मोरपखा सिर पै फहरातो।।
मैं जब तें रसखान बिलोकति ही कछु और न मोहि सुहातो।
प्रीति की रीति में लाज कहा सखि है सब सों बड़ नेह को नातो।।
21
मिलि खेलत फाग बढ्यौ अनुराग सुराग सनी सुख की रमकै।
कर कुंकुम लै करि कंजमुखी प्रिय के दृग लावन कौं धमकै।
रसखानि गुलाल की धुंधर में ब्रजबालन की दुति यौं दमकै।
मनौ सावन माँझ ललाई के माँझ चहूँ दिसि तें चपला चमकै।।
22
फूलत फूल सबै बन बागन बोलत मोर बसंत के आवत।
कोयल की किलकार सुनै सब कंत विदेसन तें तब धावत।
ऐसे कठोर महा रसखान जु नेकहु मोरी ये पीर न पावत।
सी सालत है हिय मैं जब बैरिन कोयल कूक सुनावत।
23
बिरहा की जु आँच लगी तन में जब जाय परी जमुना जल में।
बिरहानल तैं जल सूखि गयौ मछली बहीं छाँड़ि गई तल में।
जब रेत फटी रु पाताल गई तब सेस जयॊ धरती-तल में।
रसखान तबै इहि आंच मिटै जब आय कै स्याम लगैं गल में।
24
गोकुलनाथ बियोग प्रलै जिमि गोपिन नंद जसोमति जू पर।
बाहि गयौ अँसुवान प्रवाह भयौ जल में ब्रजलोक तिहू पर।
तीरथराज सी राधिका प्रान सु तो रसखान मनौं ब्रज भू पर।
पूरन ब्रह्म कै ध्यान रह्यो पिय औधि अखैबट पात के ऊपर।।
25
ए सजनी जब तें मैं सुनी मथुरा नगरी बरषा रितु आई।
लै रसखान सनेह की ताननि कोकिल मोर मलार मचाई।
साँझ ते भोर लौं भोर तें साँझ लौं गोपिन चातक ज्यौं रट लाई।
एरी सखी कहिये तो कहाँ लगि बैरी अहीर ने पीर न पाई।।
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