राजभाषा अधिनियम, 1963

राजभाषा अधिनियम (Official Languages Act – 1963) भारत में संघ के कार्यालयी प्रयोजनों के लिए हिंदी और अंग्रेजी के प्रयोग को नियंत्रित करने वाला कानून है। यह अधिनियम 1963 में पारित किया गया था और इसका मुख्य उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्थापित करना है। इस अधिनियम की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:

  1. हिंदी और अंग्रेजी का प्रयोग: संघ के सभी कार्यालयीय प्रयोजनों के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग किया जाएगा। हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखा जा सकता है।
  2. हिंदी का प्रसार: अधिनियम के तहत हिंदी के प्रसार और विकास के लिए उपाय किए जाने का प्रावधान है। इसके लिए राजभाषा विभाग की स्थापना की गई है।
  3. राजभाषा समितियाँ: विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में राजभाषा समितियाँ गठित की जाएंगी, जो हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए कार्य करेंगी।
  4. अनुवाद और प्रशिक्षण: अधिनियम के तहत हिंदी में अनुवाद की सुविधाएं और कर्मचारियों के लिए हिंदी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
  5. राजभाषा नियम: अधिनियम के तहत राजभाषा नियम बनाए जा सकते हैं, जो हिंदी के प्रयोग को नियंत्रित करेंगे।
  6. संसदीय समिति: राजभाषा के संबंध में संसदीय समिति का गठन किया जाएगा, जो हिंदी के प्रयोग की समीक्षा करेगी और सिफारिशें प्रस्तुत करेगी।
  7. अंग्रेजी का उपयोग: अधिनियम में यह प्रावधान है कि जब तक सभी राज्य हिंदी को अपनाने के लिए तैयार नहीं हो जाते, तब तक अंग्रेजी का उपयोग जारी रखा जाएगा।
  8. संशोधन (1967) : 1967 में इस अधिनियम में संशोधन किया गया, जिसके अनुसार अंग्रेज़ी के प्रयोग को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जाएगा, बल्कि हिंदी के साथ इसका उपयोग जारी रहेगा। यह संशोधन गैर-हिंदी भाषी राज्यों की मांग पर किया गया, ताकि वे प्रशासनिक कार्यों में कठिनाई महसूस न करें।

राजभाषा अधिनियम का उद्देश्य हिंदी को भारत की प्रमुख राजभाषा के रूप में स्थापित करना है, साथ ही अन्य भाषाओं के महत्व को भी मान्यता देना है। अतः यह अधिनियम हिंदी के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ भारत की भाषाई विविधिता का भी सम्मान करता है |

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