लोंजाइनस प्राचीन यूनान के महान साहित्यशास्त्री व आलोचक थे | उनके जन्म को लेकर विद्वान् एकमत नहीं हैं | अधिकांश विद्वान् ईसा की तीसरी सदी उनका जीवन काल मानते हैं | उनकी रचना ‘पेरिइप्सुस’ पाश्चात्य काव्यशास्त्र की महत्वपूर्ण पुस्तक है |
लोंजाइनस (Longinus) का उदात्त सिद्धांत (Sublime Theory) प्राचीन साहित्यिक आलोचना का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यह सिद्धांत उनके ग्रंथ “पेरिइप्सस” में प्रस्तुत किया गया है जिसका पहला अंग्रेजी अनुवाद ‘On The Sublime’ नाम से सन 1662 में जॉन हॉल ने किया | लोंजाइनस के अनुसार, उदात्त (Sublime) वह शक्ति है जो साहित्य या कला के माध्यम से पाठक या श्रोता के मन में गहरी और शक्तिशाली भावनाएं उत्पन्न करती है। यह सिद्धांत साहित्यिक गुणवत्ता को मापने का एक मानदंड प्रदान करता है।
उदात्त का स्वरूप
उदात्त (Sublime) का अर्थ है — उच्च, महान, भव्य और आत्मा को ऊँचाइयों तक ले जाने वाला सौंदर्य अनुभव। लोंजाइनस का उदात्त काव्य के भाव पक्ष और कला पक्ष दोनों से संबद्ध है | लोंजाइनस के अनुसार उदात्त में महान विचार, महान भाव और आकर्षक भाषा व शैली सम्मिलित है |
उदात्त के मूल आधार या स्रोत
लोंजाइनस ने उदात्त के पांच स्रोत बताए हैं:
(1) उदात्त विचार : साहित्य या कला में गहन और उच्च विचार होने चाहिए। यह विचार पाठक को प्रभावित करने और उसके मन को ऊंचा उठाने की क्षमता रखते हैं।
(2) उदात्त भावना : साहित्य में भावनाओं की गहनता और प्रामाणिकता होनी चाहिए। यह भावनाएं पाठक को गहराई से छूती हैं और उन्हें प्रेरित करती हैं।
(3) उदात्त भाषा और शैली : शब्दों का चयन और शैली का प्रयोग उदात्त प्रभाव पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शब्दों की सुंदरता और शक्ति पाठक को आकर्षित करती है।
(4) अलंकार और रूपक : अलंकार, रूपक, और अन्य साहित्यिक उपकरणों का सही प्रयोग उदात्त प्रभाव को बढ़ाता है। ये उपकरण साहित्य को और अधिक प्रभावशाली और सुंदर बनाते हैं।
(5) उदात्त संरचना : साहित्यिक रचना का संरचनात्मक संतुलन और व्यवस्था भी उदात्त प्रभाव पैदा करने में महत्वपूर्ण है। एक अच्छी तरह से संरचित रचना पाठक को आसानी से प्रभावित करती है।
उदात्त सिद्धांत की आलोचना या सीमाएँ
लोंजाइनस का उदात्त सिद्धांत (Sublime) साहित्यिक आलोचना में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, लेकिन इसकी कुछ सीमाएँ और आलोचनाएँ भी हैं। यहाँ उदात्त सिद्धांत की कुछ प्रमुख आलोचनाएँ दी गई हैं:
1. अस्पष्टता और व्याख्या की कठिनाई
उदात्त सिद्धांत में “उदात्त” की परिभाषा काफी अस्पष्ट है। यह एक अमूर्त अवधारणा है जिसे स्पष्ट रूप से परिभाषित करना मुश्किल है। इसके कारण, इस सिद्धांत को समझने और लागू करने में कठिनाई होती है।
2. व्यक्तिपरकता (Subjectivity)
उदात्त सिद्धांत पाठक या श्रोता की व्यक्तिगत अनुभूति पर निर्भर करता है। जो एक व्यक्ति को उदात्त लगता है, वह दूसरे को नहीं लग सकता। इसलिए, यह सिद्धांत अत्यधिक व्यक्तिपरक है और इसे सार्वभौमिक रूप से लागू करना मुश्किल है।
3. भावनाओं पर अत्यधिक जोर
लोंजाइनस ने भावनाओं की तीव्रता को उदात्त का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना है, लेकिन यह आलोचकों के अनुसार अत्यधिक भावुकता की ओर ले जा सकता है। साहित्य में केवल भावनाओं पर ध्यान केंद्रित करने से तर्क और बौद्धिक गहराई की उपेक्षा हो सकती है।
4. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सीमाएँ
उदात्त सिद्धांत प्राचीन ग्रीक और रोमन साहित्यिक परंपराओं पर आधारित है। इसलिए, यह अन्य सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों में पूरी तरह लागू नहीं हो सकता। आधुनिक साहित्य और कला में इसकी प्रासंगिकता सीमित हो सकती है।
5. शैली और शब्दावली पर अत्यधिक निर्भरता
लोंजाइनस ने शब्दावली और शैली को उदात्त का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना है, लेकिन यह आलोचकों के अनुसार साहित्य के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं (जैसे कथानक, चरित्र-चित्रण, सामाजिक संदर्भ आदि) की उपेक्षा कर सकता है।
6. नैतिकता की अनदेखी
उदात्त सिद्धांत में नैतिकता या सामाजिक उत्तरदायित्व पर जोर नहीं दिया गया है। यह सिद्धांत केवल साहित्यिक प्रभाव और सौंदर्य पर केंद्रित है, जबकि साहित्य का उद्देश्य केवल सौंदर्य या भावनाएँ उत्पन्न करना ही नहीं, बल्कि समाज को प्रेरित करना और नैतिक मूल्यों को स्थापित करना भी है।
8. रचनाकार की भूमिका की उपेक्षा
उदात्त सिद्धांत में रचनाकार की भूमिका और उसके व्यक्तित्व को कम महत्व दिया गया है। यह सिद्धांत पाठक की अनुभूति पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है, जबकि रचनाकार की मानसिकता और सामाजिक संदर्भ भी साहित्यिक रचना को प्रभावित करते हैं।
उदात्त सिद्धांत साहित्यिक आलोचना में एक महत्वपूर्ण योगदान है, लेकिन इसकी कुछ सीमाएँ और कमियाँ भी हैं। यह सिद्धांत अत्यधिक व्यक्तिपरक, भावुकता-केंद्रित, और प्राचीन साहित्यिक मानदंडों तक सीमित है। आधुनिक साहित्यिक आलोचना में इसकी प्रासंगिकता सीमित हो सकती है, लेकिन फिर भी यह साहित्यिक सौंदर्य और प्रभाव के अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करता है।
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