राज भाषा और राष्ट्र भाषा में अंतर

भारत में “राज भाषा” और “राष्ट्र भाषा” दो अलग-अलग संदर्भों में प्रयोग की जाने वाली अवधारणाएँ हैं।

राजभाषा और राष्ट्र भषा में निम्नलिखित छः अंतर हैं :

(1) राज भाषा वह भाषा है जो सरकार द्वारा आधिकारिक कार्यों, प्रशासन और संचार के लिए प्रयोग की जाती है जबकि राष्ट्र भाषा वह भाषा है जो देश की सांस्कृतिक पहचान और एकता को व्यक्त करने के लिए जनता के बीच प्रचलित होती है।

(2) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राज भाषा के रूप में मान्यता दी गई है, साथ ही अंग्रेजी को सहायक भाषा का दर्जा दिया गया है जबकि संविधान में “राष्ट्र भाषा” की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। यह एक भावनात्मक और सांस्कृतिक अवधारणा है।

(3) राज भाषा का मुख्य उद्देश्य सरकारी कार्यों को सुचारु रूप से चलाना और विभिन्न राज्यों के बीच संचार स्थापित करना है जबकि राष्ट्र भाषा का उद्देश्य देश की जनता को एक सूत्र में बाँधना और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना है।

(4) राज भाषा मुख्य रूप से प्रशासनिक दस्तावेजों, कानून, संसद और सरकारी संचार में प्रयोग होती है जबकि राष्ट्र भाषा सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संदर्भों में जनता द्वारा प्रयोग की जाती है।

(5) राज भाषा के रूप में हिंदी को सभी राज्यों में अनिवार्य रूप से स्वीकार नहीं किया जाता, खासकर गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों में जबकि राष्ट्र भाषा के रूप में हिंदी को भावनात्मक रूप से स्वीकार करने की बात होती है, लेकिन यह विवादास्पद भी रही है क्योंकि भारत बहुभाषी देश है |

(6) राज भाषा को निर्धारित करना एक नीतिगत निर्णय है जो सरकार द्वारा लिया गया है और समय के साथ विकसित किया जा रहा है। जबकि राष्ट्र भाषा जनता की भावनाओं, इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर से उत्पन्न व विकसित होती है।

संक्षेप में, राज भाषा एक औपचारिक और प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है, जबकि राष्ट्र भाषा देश की आत्मा और एकता का प्रतीक मानी जाती है।

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