साँप ( Saanp ) : अज्ञेय

साँप ! तुम सभ्य तो हुए नहीं नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया | एक बात पूछूं ( उत्तर दोगे? ) तब कैसे सीखा डँसना – विष कहाँ से पाया? प्रसंग — प्रस्तुत कविता हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘समकालीन हिंदी कविता’ में संकलित अज्ञेय द्वारा रचित ‘साँप’ कविता से अवतरित है | प्रस्तुत कविता के … Read more

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का साहित्यिक परिचय ( Agyey Ka Sahityik Parichay )

जीवन परिचय – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ हिंदी के प्रमुख साहित्यकार हैं | प्रयोगवाद के जनक के रूप में पहचाने जाने वाले अज्ञेय जी का जन्म उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में सन 1911 में हुआ | 1925 ईस्वी में इन्होंने मैट्रिक और 1929 ईस्वी में विज्ञान संकाय में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की | ये … Read more

नाच ( Naach ) : अज्ञेय

एक तनी हुई रस्सी है जिस पर मैं नाचता हूँ | जिस तनी हुई रस्सी पर मैं नाचता हूँ | वह दो खंभों के बीच है | रस्सी पर मैं जो नाचता हूँ | वह एक खंभे से दूसरे खंबे तक का नाच है | दो खंभों के बीच जिस तनी हुई रस्सी पर मैं … Read more

उड़ चल, हारिल ( Ud Chal Haaril ) : अज्ञेय

उड़ चल, हारिल, लिये हाथ में यही अकेला ओछा तिनका उषा जाग उठी प्राची में -कैसी बाट भरोसा किनका ! शक्ति रहे तेरे हाथों में – छूट ना जाय यह चाह जीवन की ; शक्ति रहे तेरे हाथों में – रुक ना जाय यह गति जीवन की ! (1) ऊपर-ऊपर-ऊपर-ऊपर-बढा चीरता चल दिक् मण्डल, अनथक … Read more

जयशंकर प्रसाद का साहित्यिक परिचय ( Jaishankar Prasad Ka Sahityik Parichay )

जीवन परिचय – जयशंकर प्रसाद का जन्म सन 1889 में काशी में हुआ था | जयशंकर प्रसाद जी धनी परिवार से संबंध रखते थे | इनका बचपन बहुत खुशहाली से बीता | इनकी आरंभिक शिक्षा घर पर ही हुई परंतु वह केवल सातवीं कक्षा तक अपनी पढ़ाई जारी रख सके | जब वे 12 वर्ष … Read more

जागो फिर एक बार ( Jago Fir Ek Bar ) ( सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ): व्याख्या व प्रतिपाद्य

जागो फिर एक बार ( निराला ) : सप्रसंग व्याख्या जागो फिर एक बार ! समर में अमर कर प्राण, गान गाये महासिंधु-से, सिंधु-नद तीरवासी ! सेंधव सुरंगों पर चतुरंग-चमू-संग ; “सवा-सवा लाख पर एक को चढाऊंगा, गोविंद सिंह निज नाम जब कहाऊंगा |” किसी ने सुनाया यह वीर-जनमोहन, अति दुर्जय संग्राम-राग, फाग था खेला … Read more

तोड़ती पत्थर ( Todti Patthar ) (सूर्यकांत त्रिपाठी निराला): व्याख्या व प्रतिपाद्य

‘तोड़ती पत्थर’ कविता की व्याख्या वह तोड़ती पत्थर ; देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर वह तोड़ती पत्थर नहीं छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार ; श्याम तन भर बंधा यौवन, नत-नयन, प्रिय-कर्म-रत मन, गुरु हथौड़ा हाथ, करती बार-बार प्रहार सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार | (1) चढ़ रही थी धूप, गर्मियों के … Read more

बादल राग ( Badal Raag ) ( सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ): व्याख्या व प्रतिपाद्य

‘बादल राग’ कविता की व्याख्या तिरती है समीर-सागर पर अस्थिर सुख पर दुख की छाया जग के दग्ध हृदय पर निर्दय विप्लव की प्लावित माया यह तेरी रण-तरी, भरी आकांक्षाओं से, घन, भेरी-गर्जन से सजग, सुप्त अंकुर उर में पृथ्वी के, आशाओं से नव जीवन की, ऊंचा कर सिर, ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के … Read more

विधवा ( Vidhva ) : सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ( सप्रसंग व्याख्या व प्रतिपाद्य ) ( BA Hindi – 3rd Semester )

‘विधवा’ कविता का प्रतिपाद्य / विषय या संदेश सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ छायावाद के चार आधार-स्तंभों में से एक हैं | निराला संभवत: प्रथम छायावादी कवि हुए हैं जिन्होंने सर्वप्रथम प्रगतिशील विचारों को अपनी कविता में स्थान दिया | भिक्षुक, विधवा, तोड़ती पत्थर, बादल राग और कुकुरमुत्ता जैसी कविताएं ऐसी ही कवितायें हैं जिनमें निराला जी … Read more

पवनदूती काव्य में निहित संदेश / उद्देश्य ( Pavandooti Kavya Mein Nihit Sandesh / Uddeshya )

‘पवनदूती’ ( पवन दूतिका ) नामक काव्य अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित ‘प्रियप्रवास’ शीर्षक महाकाव्य का एक अंश है | इस महाकाव्य में श्री कृष्ण के मथुरा जाने की घटना का उल्लेख है | श्री कृष्ण के मथुरा गमन करते ही ब्रजवासी विरह-वेदना से व्यथित हो उनके जीवन की विभिन्न घटनाओं का स्मरण करते … Read more

हिंदी पत्रकारिता का उद्भव एवं विकास ( Hindi Patrakarita Ka Udbhav Evam Vikas )

प्राक्कथन पत्रकारिता का संबंध समाचार पत्रों से है | समाचार पत्र समाचारों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाते हैं | समाचार पत्र किसी घटना या सूचना को मुद्रित रूप में पाठकों के सामने लाते हैं | इस प्रकार देश के किसी कोने की घटना की सूचना दिल्ली या चंडीगढ़ के समाचार पत्रों के … Read more

राधा की विरह-वेदना (पवनदूती) ( Radha Ki Virah Vedna ) : अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ( BA – 3rd Semester )

‘पवन दूती’ शीर्षक काव्य अयोध्या सिंह उपाध्याय द्वारा रचित खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्य ‘प्रियप्रवास’ का अवतरण है | इस कविता का प्रमुख विषय राधा के विरह का चित्रण करना है | श्री कृष्ण मथुरा के राजा कंस के आमंत्रण पर मथुरा चले गए परंतु पुन: लौटकर नहीं आए | इधर राधा श्री कृष्ण के … Read more

भारत-भारती ( Bharat Bharati ) : मैथिलीशरण गुप्त

मानस-भवन में आर्यजन, जिसकी उतारें आरती – भगवान ! भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती | हो भद्रभावोदभाविनी वह भारती हे भगवते ! सीतापते ! सीतापते !! गीतामते ! गीतामते || (1) प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक में संकलित ‘भारत भारती’ नामक कविता से अवतरित है | इस कविता के रचयिता राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण … Read more

द्विवेदी युग : समय-सीमा, प्रमुख कवि तथा प्रवृत्तियाँ ( Dvivedi Yug : Samay Seema, Pramukh Kavi V Pravrittiyan )

हिंदी साहित्य के इतिहास को मुख्यत: तीन भागों में बांटा जा सकता है आदिकाल,  मध्यकाल और आधुनिक काल | आदिकाल की समय सीमा संवत 1050 से संवत 1375 तक मानी जाती है | मध्य काल के पूर्ववर्ती भाग को भक्तिकाल तथा उत्तरवर्ती काल को रीतिकाल के नाम से जाना जाता है |  भक्तिकाल की समय-सीमा … Read more

जयद्रथ वध ( Jaydrath Vadh ) : मैथिलीशरण गुप्त ( सप्रसंग व्याख्या )

जयद्रथ वध ( मैथिलीशरण गुप्त ) : व्याख्या उन्मत्त विजयोल्लास से, सब लोग मत-गयन्द-से, राजा युधिष्ठिर के निकट पहुंचे बड़े आनंद से | देखा युधिष्ठिर ने उन्हें जब, जान ली निज जय तभी, सुख-चिन्ह से ही चित्त की बुध जान लेते हैं सभी || तब अर्जुनादिक ने उन्हें बढ़कर प्रणाम किया वहां, सिर पर उन्होंने … Read more

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